December 2, 2007 by mahabalishaka
खुली खिड़की, फड़फड़ाते पन्ने
गर्म चाय की ठन्ढी भाप,
वर्तमान हैं,सभी अतीत के,
कहे-सुने शब्दों के ताप !
समय की चादर सरक-सरक कर,
घुटनों तक आ ठहरी है,
यौवन के कुछ एक पलों की
चोट अभी भी गहरी है !
जीवन के रफ्तार से पिछड़ी
भावुकता की ओछी सोच,
दो पैरों के उपर सम्भला,
चन्द क्षणिक सासों का बोझ !
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November 27, 2007 by mahabalishaka
बच्चे जो बड़े हो गए !
जीवन की अभिव्यक्ति को,
जठारानल की तृप्ति को,
अपने पैरो पे खडे हो गए !
बचपन क्या, मनमानी क्या ?
पढ़ने में आनाकानी क्या ?
कहाँ कथाएं परियों की,
दादी क्या और नानी क्या ?
स्वप्न-लोक के द्वार को छूने,
सड़क पे पड़े-पड़े सो गए !
बच्चे जो बड़े हो गए !
शोक नहीं,मुस्कान नहीं,
भावुकता का ज्ञान नहीं !
निरुद्देश्य जीवन के पथ पे
चले शरीर, पर प्राण नहीं !
वृहद् सृष्टि के, सुक्ष्म पलों में
भाव-विहीन गड़े खो गए !
बच्चे जो बड़े हो गए !
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November 27, 2007 by mahabalishaka
प्रारंभ हुआ दारुण जगत के,
लेखनी से संबोधन का !
विकल समष्ठी के प्रारंभिक
हास्य-रथ आरोहन का !
वर्षा विगत शरद ऋतू आयी,
नीरस नपुंसक सलिल चली !
व्यंग्य-कीट के क्लिष्ट कुसंग से,
समर में उतरे महाबली !
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