बच्चे जो बड़े हो गए !
जीवन की अभिव्यक्ति को,
जठारानल की तृप्ति को,
अपने पैरो पे खडे हो गए !
बचपन क्या, मनमानी क्या ?
पढ़ने में आनाकानी क्या ?
कहाँ कथाएं परियों की,
दादी क्या और नानी क्या ?
स्वप्न-लोक के द्वार को छूने,
सड़क पे पड़े-पड़े सो गए !
बच्चे जो बड़े हो गए !
शोक नहीं,मुस्कान नहीं,
भावुकता का ज्ञान नहीं !
निरुद्देश्य जीवन के पथ पे
चले शरीर, पर प्राण नहीं !
वृहद् सृष्टि के, सुक्ष्म पलों में
भाव-विहीन गड़े खो गए !
बच्चे जो बड़े हो गए !
November 28, 2007 at 12:45 pm
bahut utkrisht kavitayen hain mahabali. Keep it up rahega humari taraf se
November 29, 2007 at 5:57 pm
Humko naa aata hai itnaa accha hindi likhnaa
December 1, 2007 at 4:50 pm
Bahut khoob…
Kya likhte ho boss!!!
Keep writing….
Cheerz