प्रारंभ हुआ दारुण जगत के,
लेखनी से संबोधन का !
विकल समष्ठी के प्रारंभिक
हास्य-रथ आरोहन का !
वर्षा विगत शरद ऋतू आयी,
नीरस नपुंसक सलिल चली !
व्यंग्य-कीट के क्लिष्ट कुसंग से,
समर में उतरे महाबली !
प्रारंभ हुआ दारुण जगत के,
लेखनी से संबोधन का !
विकल समष्ठी के प्रारंभिक
हास्य-रथ आरोहन का !
वर्षा विगत शरद ऋतू आयी,
नीरस नपुंसक सलिल चली !
व्यंग्य-कीट के क्लिष्ट कुसंग से,
समर में उतरे महाबली !
नवम्बर 30, 2007 को 12:30 अपराह्न पर |
badiya likha hai arun …first 2 lines achi hai …. aur last line se puri kavita ka meaning samajh aa jat ahai ….. good