बुढापा !
खुली खिड़की, फड़फड़ाते पन्ने
गर्म चाय की ठन्ढी भाप,
वर्तमान हैं,सभी अतीत के,
कहे-सुने शब्दों के ताप !
समय की चादर सरक-सरक कर,
घुटनों तक आ ठहरी है,
यौवन के कुछ एक पलों की
चोट अभी भी गहरी है !
जीवन के रफ्तार से पिछड़ी
भावुकता की ओछी सोच,
दो पैरों के उपर सम्भला,
चन्द क्षणिक सासों का बोझ !
December 19, 2007 at 1:22 pm
meethi yaadein yauvan ki
ab bhi thandak pahunchaati hain..
saamne khade dekh yamdut ko
saanse thar thar kanp jaati hain..